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अनुभूति में सजीवन मयंक की
रचनाएँ -

नई ग़ज़लें-

एक दुश्मन
क्यों करते हो बात
मुझे चिढ़ा रहे हैं
यही सोचकर निकला

क्षणिकाओं में-
पाँच क्षणिकाएँ

अंजुमन में-
अजब यह माजरा देखा
अब आए बादल
आकाश साफ़ है
ज़िंदगी सिर्फ़ पानी रही
तूफ़ान से टकराते हैं
नचाते रहे पहले कठपुतलियाँ
भटक रहे हैं बाबू जी
याद आता है
सभी को लुत्फ़ आता है
हमको कोई गिला नहीं

कविताओं में-
जीवन क्या है
दीये का वक्तव्य

गीतों में-
अमावस का दर्द
असीम स्वर खटक रहे हैं
खेतों में जिनका देवालय
गीता हो रहीम के घर में
पथ के विंध्याचल

संकलन में-
मेरा भारत-
आज तिरंगा फहराता है शान से
माटी चंदन है
मातृभाषा के प्रति-
हिंदी ने हमको एक रखा
हिंदी में कितना अपनापन
जग का मेला-
बंदर मामा

 

दीये का वक्तव्य

दिया रात भर जला अकेला
उससे हठी पवन तब बोला
शायद तू नादान अभी है
भले बुरे का ज्ञान नहीं है
ज्योंही होगी सुबह तुझे सब भूल जाएँगे
याद रहा तो आकर तुझको फूँक जाएँगे
इसलिए व्यर्थ ही देह मत जला
सोजा

दिया ज़ोर से हँसा और फिर बोला।
सो तो जाऊँ लेकिन सूरज
कल सबसे ये बात कहेगा।
एक रात भर जल पाने की दीये की
औकात नहीं है
जबकि ऐसी बात नहीं है।

इसीलिए उसके आने पर
टा-टा करके मैं बुझ जाता
लेकिन मेरे आने तक तो
जाने कब सूरज सो जाता।

1 जून 2006

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