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नई ग़ज़लें-

एक दुश्मन
क्यों करते हो बात
मुझे चिढ़ा रहे हैं
यही सोचकर निकला

क्षणिकाओं में-
पाँच क्षणिकाएँ

अंजुमन में-
अजब यह माजरा देखा
अब आए बादल
आकाश साफ़ है
ज़िंदगी सिर्फ़ पानी रही
तूफ़ान से टकराते हैं
नचाते रहे पहले कठपुतलियाँ
भटक रहे हैं बाबू जी
याद आता है
सभी को लुत्फ़ आता है
हमको कोई गिला नहीं

कविताओं में-
जीवन क्या है
दीये का वक्तव्य

गीतों में-
अमावस का दर्द
असीम स्वर खटक रहे हैं
खेतों में जिनका देवालय
गीता हो रहीम के घर में
पथ के विंध्याचल

संकलन में-
मेरा भारत-
आज तिरंगा फहराता है शान से
माटी चंदन है
मातृभाषा के प्रति-
हिंदी ने हमको एक रखा
हिंदी में कितना अपनापन
जग का मेला-
बंदर मामा

 

अजब ये माजरा देखा

पुराना ठूँठ बरगद का पुन: हमने हरा देखा
लगाए जो नए पौधे सभी को अधमरा देखा

सभी दुकानदारों ने जिसे लौटा दिया था कल
जो खोटा था कभी सिक्का उसी को अब खरा देखा

किसे हम दोष दें यारों हमारी ऐसी किस्मत है
गिरी है वहीं पर बिजली जहाँ पर आसरा देखा

जहाँ इंसाफ़ अंधा है सभी कानून बहरे हैं
वहाँ गूँगे हैं फरियादी अजब ये माजरा देखा

बहुत उम्मीद लेकर आईने के पास पहुँचे हम
वहाँ अपनी शक्ल का आदमी कोई दूसरा देखा

1 जून 2006

 

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