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अनुभूति में सजीवन मयंक की
रचनाएँ -

नई ग़ज़लें-

एक दुश्मन
क्यों करते हो बात
मुझे चिढ़ा रहे हैं
यही सोचकर निकला

क्षणिकाओं में-
पाँच क्षणिकाएँ

अंजुमन में-
अजब यह माजरा देखा
अब आए बादल
आकाश साफ़ है
ज़िंदगी सिर्फ़ पानी रही
तूफ़ान से टकराते हैं
नचाते रहे पहले कठपुतलियाँ
भटक रहे हैं बाबू जी
याद आता है
सभी को लुत्फ़ आता है
हमको कोई गिला नहीं

कविताओं में-
जीवन क्या है
दीये का वक्तव्य

गीतों में-
अमावस का दर्द
असीम स्वर खटक रहे हैं
खेतों में जिनका देवालय
गीता हो रहीम के घर में
पथ के विंध्याचल

संकलन में-
मेरा भारत-
आज तिरंगा फहराता है शान से
माटी चंदन है
मातृभाषा के प्रति-
हिंदी ने हमको एक रखा
हिंदी में कितना अपनापन
जग का मेला-
बंदर मामा

 

गीता हो रहीम के घर

गीता हो, रहीम के घर में, रामू पढ़े कुरान
जो मस्जिद का खुदा, वहीं है मंदिर में भगवान

एक हमारी धरती हमको मिला एक आकाश
सूरज बाँट रहा सबके घर, नूतन नित्य प्रकाश
जात-पात के बंधन, हमको बाँध नहीं पाए
स्वयमेव जागा है ऐसा, जन मन में विश्वास
रंग बिरंगी फुलवारी-सा, अपना हिंदुस्तान

जो मस्जिद का खुदा, वहीं है मंदिर में भगवान

अब्दुल के हाथों में, राधा ने बाँधी राखी
हमने जगह-जगह भेजे हैं शांति के पाँखी
भिन्न धर्म की सरिताएँ है, फिर भी जल है एक
ऐसे अप‌नेप‌न की देखी, कहीं नहीं झाँकी
गुरुद्वारा या गिरजा घर हो सबका है सम्मान
जो मस्जिद का खुदा, वहीं है मंदिर में भगवान

सब धर्मों का सार, सभी इंसान बराबर हैं
सबके लिए एक आँगन पर अलग-अलग घर है
भाषाएँ हो अलग प्यार की, भाषा फिर भी एक
हम सब बहते हुए नीर पर, हस्ताक्षर भर हैं
एक तिरंगा एक हमारा जन-गण-मन का गान
जो मस्जिद का खुदा, वहीं है मंदिर में भगवान

16 अगस्त 2006

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