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रचनाएँ -

नई ग़ज़लें-

एक दुश्मन
क्यों करते हो बात
मुझे चिढ़ा रहे हैं
यही सोचकर निकला

क्षणिकाओं में-
पाँच क्षणिकाएँ

अंजुमन में-
अजब यह माजरा देखा
अब आए बादल
आकाश साफ़ है
ज़िंदगी सिर्फ़ पानी रही
तूफ़ान से टकराते हैं
नचाते रहे पहले कठपुतलियाँ
भटक रहे हैं बाबू जी
याद आता है
सभी को लुत्फ़ आता है
हमको कोई गिला नहीं

कविताओं में-
जीवन क्या है
दीये का वक्तव्य

गीतों में-
अमावस का दर्द
असीम स्वर खटक रहे हैं
खेतों में जिनका देवालय
गीता हो रहीम के घर में
पथ के विंध्याचल

संकलन में-
मेरा भारत-
आज तिरंगा फहराता है शान से
माटी चंदन है
मातृभाषा के प्रति-
हिंदी ने हमको एक रखा
हिंदी में कितना अपनापन
जग का मेला-
बंदर मामा

 

क्यों करते हो बात

क्यों करते हो बात शहर की।
जहाँ मुसीबत दुनिया भर की।।

फुटपाथों पर कटी ज़िंदगी।
रही तमन्ना अपने घर की।।

सपनों में दिखती तसवीरें।
कल के बिगड़े हुये सफ़र की।।

घर तक पीछा नहीं छोड़तीं।
दिन भर की बातें दफ्तर की।।

बच्चों ने ये कब सोचा है।
हमने कैसे गुज़र बसर की।।

सब कुछ लुटा चुके तब जाना।
कद्र नहीं है किसी हुनर की।।

जब भी चला जमीं को देखा।
नज़र नहीं मैंने ऊपर की।।

१६ मार्च २००९
 

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