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अनुभूति में मधु शुक्ला की रचनाएँ-

छंदमुक्त में-
अनछुआ ही रहा
जाने कहाँ छिप गयी वो
पानी की जंग
मेरे इर्दगिर्द मेरे आसपास
यादों की चील

  यादों की चील

लम्हा- लम्हा गुज़रता रहा वक्त
बनाता हुआ फ़ासले
हमारे दरमियाँ
और हम देखते रहे
बने हुए बुत
उम्मीदों को टूटते
आशाओं को छूटते
तार- तार होते भावनाओं को आहत
उधड़ते हुये आस्थाओं को परत-दर-परत।

खामोशी के साये में
धुँधलाते रहे चाहत के दीये
खिंचते गये हमारे बीच अहम के हाशिये
बदल गयीं प्रेम की परिभाषाएँ रिश्तों के अर्थ
मौन से बँधी रहीं मेरी विवशताएँ और तुम्हारा दर्प
तुम्हारी शर्तों के दायरे में सिमटते - सिमटते
ठूँठ हो गये हैं सपनों के दरख्त।

अब नहीं भरते उड़ान इस ओर
कल्पनाओं के रंग- बिरंगे पंछी
नहीं फुदकती इन शाखाओं में
उमंगों की चंचल गिलहरियाँ
पीठ पर लिये उँगलियों के निशान
दिख जाती बैठी बस
यादों की चील
घूरती हुई
घुप सन्नाटों में
कभी- कभी यों ही वक्त- बेवक्त ।
लम्हा- लम्हा गुज़रता रहा वक्त।

१ जून २०२२

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