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अनुभूति में मधु शुक्ला की रचनाएँ-

छंदमुक्त में-
अनछुआ ही रहा
जाने कहाँ छिप गयी वो
पानी की जंग
मेरे इर्दगिर्द मेरे आसपास
यादों की चील

 

  मेरे इर्द- गिर्द, मेरे आस-पास

तन्हाइयों के सादे सपाट कागज पर
उभरते तुम्हारी स्मृतियों के हस्ताक्षर
प्रमाणित कर देते हैं, तुम्हारे होने का अहसास
मेरे इर्द- गिर्द, मेरे आस - पास।

सन्नाटों की गोद में पनपता
तुम्हारा वजूद
लेने लगता है आकार
होने लगते हैं तार- तार
सारे आवरण
छटने लगती है धुंध परत- दर - परत
स्पष्ट होने लगता है मन का आकाश।

जकड़ने लगता है चेतना को
अपनी गिरफ्त में
कदम- दर-कदम फैलता
तुम्हारा विस्तार
शून्य में होता साकार
मौन की दहलीज में
दस्तक देती तुम्हारी आहट
झंकृत कर देती है रह - रह कर
तुम्हारे स्पर्श का आभास।

समय की चादर सरका कर
झाँकता अतीत
करवटें लेने लगती हैं सोयी इच्छायें
जीवन्त हो उठता है सबकुछ
एका-एक
ज्यों का त्यों, वैसे का वैसा
हो जाते हैं निरर्थक
तुम्हें भूलने के सारे प्रयास।
मेरे इर्द- गिर्द, मेरे आस पास
तुम्हारे होने का अहसास।

१ जून २०२२

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