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अनुभूति में महावीर शर्मा की रचनाएँ-

नई ग़ज़लें-
अदा देखो
जब वतन छोड़ा
दिल की ग़म से दोस्ती
भूलकर ना भूल पाए
सोगवारों में
 

अंजुमन में-
अधूरी हसरतें
ग़ज़ल
ज़िन्दगी से दूर
पर्दा हटाया ही कहाँ है?
प्रेम डगर
बुढ़ापा
ये ख़ास दिन

कविताओं में-
दो मौन

संकलन में-
दिये जलाओ- दीप जलते रहे
चराग आँधियों में
मौसम-भावनाओं के मौसम
फागुन के रंग-होली का संदेशा
 

 

ग़ज़ल

सोचा था बयाबान में, इक आशियाँ बनाएँ हम
पीछा ना छोड़ा, आ गईं ये अपनी ही परछाइयाँ।

गुलशन से की थी दोस्ती, पर ख़ार दामन में मिले
हर कदम पर अनगिनत मिलती रही रूसवाइयाँ।

गुलशन से ये दिल भर गया, सहरा का आँचल मिल गया
मैं हूँ, तुम हो और बस अपनी ही परछाइयाँ।

आज़मा न हमको सूरज, धूप के शोले बरसा कर
ढल जाएगा तू देख कर, इश्क की गरमाइयाँ।

"अपनों" ही से इस क़दर सदमे उठाए उम्र भर
रास है वीराना ये, बस तुम हो और तनहाइयाँ।

कहने को हैं वो हमसुखन, नश्तर चुभोने के लिए
दर बदर फिरते रहे, है उनकी मेहरबानियाँ।

मौत जब टकराएगी, होगा न पंडित मौलवी
रो कर कहेगी "अलविदा", मिटती हुई परछाइयाँ।

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