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दीपावली महोत्सव
२००४

दिये जलाओ
संकलन

चराग आँधियों में

  चराग आँधियों में जलते रहेंगे
हर गाम पर दीये जलते रहेंगे।
 
चारों तरफ़ है दिवाली का आलम
ये खास शब हैं, सब मिलते रहेंगे।
 
झिलमिलाते रहे हैं चराग़े–नशेमन
जलते रहे हैं, मचलते रहेंगे।
 
चराग़ों की लौ सितारों की ज़ौ तक
हर दिल में जलवे पलते रहेंगे।
 
सितारों का ये कारवाँ आ रहा है
नन्हे दियों से ये चलते रहेंगे।
 
पैग़ामे मुहब्बत शब दे रही है
खुशियों के दीपक जलते रहेंगे।
 
ज़मीं आज देखो दुलहन बनी है
ज़मीं आसमाँ यों ही मिलते रहेंगे।
 
—महावीर शर्मा

दिये जलाओ
संकलन

दिये सा वो

  दिये सा वो माना जलता रहा है
मगर आँधियों में संभलता रहा है
 
जला साथ सबके वो जीवन में वर्ना
अकेला ही सब ओर चलता रहा है
 
कभी तो बदल जाएगी इसकी किस्मत
इसी आस में दीप जलता रहा है
 
गया वक्त मेरा कभी जो न लौटा
सदा मुझको ख्वाबों में छलता रहा है
 
खुशी एक नन्हीं सी क्या आई घर में
मेरा दिल लहर सा उछलता रहा है
 
 न ग़म था उसे ऐ 'उषा' मंज़िलों का
वो लोहे के मानिंद ढलता रहा है
 
 —उषा राजे सक्सेना

दीप-दीप जलते देखा

घर-आँगन सीढ़ी-दालन
पग-पग जगमग
एक गरीब थक कर
चूर-चूर लगभग
उसके अश्रु-धार में
बिंबित दीपों से,
एक अरुण को उगते देखा
दीप-दीप जलते देखा
"मैं जाऊँगा छत पर
तुम जाओ आँगन में . . ."
दीप सजाने की खिंचातानी में
बाल-द्वंद्व छिड़ते देखा
दीप-दीप जलते देखा
जिस घर में
तम ही तम था
बरसों से,
विलग बेरंग पतझड़ सा
था दूर जीवन-रसों से,
उस घास-फूस के
झोपड़ को
एक महल-सा
स्वर्णिम किरणों से
झिमिर-झिमिर
झलते देका
दीप-दीप जलते देखा
एक-एक कण
माँ धरती का,
ओज़-ओज़ से
ओत-प्रोत
. . .और
पराजित तम के राजा को
हाथों को मलते देखा
दीप-दीप जलते देखा
दीप-दीप से
शोभित-प्रदीप्त नगर के
अवलोकन का अभिनय करते
अपने-अपने मुँडेरों पर
प्रेमासक्त प्रेमी नयनों में
एक स्वप्न को पलते देखा
दीप-दीप जलते देखा
बिरहन टुक-टुक
नयन लगाए
अश्रु धर से
रत्नेश बनाए
पिया बरसों से घर ना आए
पिया के आने पर
आस भरे नयनों में
विरह-व्यथा घुलते देखा
दीप-दीप जलते देखा

—अशुतोष कुमार सिंह

    

 

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