अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

अनुभूति में अभिरंजन कुमार की रचनाएँ—

नई रचनाओं में—
तुम्हारी आँखों के बादलों में
बातें तुम्हारी प्रिये...
मैं अनोखा हो गया हूँ

हाइकु में—
जाड़े का हाइकु¸ प्रियतमा के लिए¸ महानगर के हाइकु¸ गाँव के हाइकु¸ संदेश

कविताओं में—
चालू आरे नंगा नाच
भस्मासुर जा रहा
हँसो गीतिक हँसो
होली बीती

  दस हाइकु

जाड़े का हाइकु
जाड़े में भैया
धूप नरम दीखी
छाँव सरीखी।

प्रियतमा के लिए
प्रिये! रूपसि!
होठों पर तुम हो
नर्म धूप-सी!

महानगर के हाइकु
आबादी लाखों,
फिर भी वीरान ये
महानगर।

भीड़ है सब
कोई नहीं अपना
टूटा सपना।

ज़मीं भी नहीं
आसमान भी नहीं
बने त्रिशंकु।

बीच में कहीं
कहने को कमरे
धूप, न हवा।

आया सूरज
न आँगन, न छत
बालकनी पे।

बंद कमरे
बने हुए कातिल
मुक्त साँस के।

गाँव के हाइकु
गाँव अब भी
करते हैं स्वागत
धूप हवा से।

संदेश
धूप औ' हवा
रखना बचाकर
असली दवा।

९ फरवरी २००६

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter