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अनुभूति में संजय ग्रोवर की रचनाएँ

नई ग़ज़लें--
जुबां तक बात
झूठ पहनकर
वाह रे वाह
सूरज

अंजुमन में
असलियत के साथ
आज मुझे
आ जाएँगे
इनको बुरा लगा
उसको मैं अच्छा लगता था
उसे अपने दिल में
क्यों करते हैं मेहनत
किस्सा नहीं हूँ
कोई बात हुई
ग़ज़लों में रंग
जब भी लोगों से मिलता हूँ
जो गया
डर में था
तितलियाँ
तीर छूटा
तुम देखना
तौबा तौबा
दर्द को इतना जिया
दासी बना के मारा
दिन हैं क्या बदलाव के
पागलों की इस कदर
बह गया मैं
बाबा
बोलता बिलकुल नहीं था
भेद क्या बाकी बचा है
मोहरा अफवाहें फैलाकर
मौत की वीरानियों में
मंज़िलों की खोज में
यह जुदा इक मसअला है
रोज़ का उसका
लड़केवाले लड़कीवाले
लोग कैसे ज़मीं पे
सच कहता हूँ
सोचना
हो गए सब कायदे

महिला दिवस पर विशेष
स्त्री थी कि हँस रही थी
हमारी किताबों में हमारी औरतें

 

सूरज

तलघर में आयोजित सूरज
फ़िर निकला प्रायोजित सूरज

किरनें-विरनें गयी कहाँ पर !
हुआ कहाँ विनियोजित सूरज?

ख़ुदकी गर्मी से जलता है
कैसे हो अनुशासित सूरज

चाँद-वाँद सब जल जाएंगे
हुआ अगर अनियंत्रित सूरज

आसमान के पाँव पकड़ कर
हो जाता अनुमोदित सूरज

पीछे साजिश का अंधियारा
आगे पूर्व-नियोजित सूरज

२० सितंबर २०१०

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