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अनुभूति में संजय ग्रोवर की रचनाएँ

नई ग़ज़लें--
उसे अपने दिल में
जब भी लोगों से मिलता हूँ
दिन हैं क्या बदलाव के
भेद क्या बाकी बचा है
मोहरा अफवाहें फैलाकर
यह जुदा इक मसअला है

अंजुमन में
असलियत के साथ
आज मुझे
आ जाएँगे
इनको बुरा लगा
उसको मैं अच्छा लगता था
क्यों करते हैं मेहनत
किस्सा नहीं हूँ
कोई बात हुई
ग़ज़लों में रंग
जो गया
डर में था
तितलियाँ
तीर छूटा
तुम देखना
तौबा तौबा
दर्द को इतना जिया
दासी बना के मारा
पागलों की इस कदर
बह गया मैं
बाबा
बोलता बिलकुल नहीं था
मौत की वीरानियों में
मंज़िलों की खोज में
रोज़ का उसका
लड़केवाले लड़कीवाले
लोग कैसे ज़मीं पे
सच कहता हूँ
सोचना
हो गए सब कायदे

महिला दिवस पर विशेष
स्त्री थी कि हँस रही थी
हमारी किताबों में हमारी औरतें

 

मंज़िलों की खोज में

मंज़िलों की खोज में तुमको जो चलता-सा लगा
मुझको तो वो ज़िंदगी भर घर बदलता-सा लगा

धूप आई तो हवा का दम निकलता-सा लगा
और सूरज भी हवा को देख जलता-सा लगा

झूठ जबसे चाँदनी बन भीड़ को भरमा गया
सच का सूरज झूठ के पाँवों पे चलता-सा लगा

मेरे ख़्वाबों पर ज़मीनी सच की बिजली जब गिरी
आसमानी बर्फ़ का भी दिल दहलता-सा लगा

चंद कतरे ठंडे काग़ज़ के बदन को तब दिए
खून जब अपनी रगों में कुछ उबलता-सा लगा

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