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अनुभूति में संजय ग्रोवर की रचनाएँ

नई ग़ज़लें--
उसे अपने दिल में
जब भी लोगों से मिलता हूँ
दिन हैं क्या बदलाव के
भेद क्या बाकी बचा है
मोहरा अफवाहें फैलाकर
यह जुदा इक मसअला है

अंजुमन में
असलियत के साथ
आज मुझे
आ जाएँगे
इनको बुरा लगा
उसको मैं अच्छा लगता था
क्यों करते हैं मेहनत
किस्सा नहीं हूँ
कोई बात हुई
ग़ज़लों में रंग
जो गया
डर में था
तितलियाँ
तीर छूटा
तुम देखना
तौबा तौबा
दर्द को इतना जिया
दासी बना के मारा
पागलों की इस कदर
बह गया मैं
बाबा
बोलता बिलकुल नहीं था
मौत की वीरानियों में
मंज़िलों की खोज में
रोज़ का उसका
लड़केवाले लड़कीवाले
लोग कैसे ज़मीं पे
सच कहता हूँ
सोचना
हो गए सब कायदे

महिला दिवस पर विशेष
स्त्री थी कि हँस रही थी
हमारी किताबों में हमारी औरतें

 

स्त्री थी कि हँस रही थी

और स्त्री थी कि हँस रही थी

वे ज़रा हैरान हुए कि
उनकी उपस्थिति में भी

अब वे हँसे उसकी हँसी पर
फिर ठिठके

क्यों कि स्त्री थी कि हँस रही थी

अब वे हकबकाए
फिर घूरा उन्होंने ज़ोर से

मगर स्त्री फिर भी हँस रही थी

अब वे हमके, थमके, भभके
अंतत: लपके
कि कुछ कर ही डालेंगे इसका

मगर वह और तेज़ हँसी

अब वे ढूँढ़ा किए यहाँ-वहाँ वो ज़माना कि
जब उनके हँसने से वह
घबरा जाती थी, लाल हो उठती थी,
पल्लू सम्हालती थी,

आख़िरकार रो ही पड़ती थी

मगर नहीं मिला उन्हें कहीं कुछ

और स्त्री थी कि हँस रही थी

9 मार्च 2005

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