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अनुभूति में संजय ग्रोवर की रचनाएँ

नई ग़ज़लें--
उसे अपने दिल में
जब भी लोगों से मिलता हूँ
दिन हैं क्या बदलाव के
भेद क्या बाकी बचा है
मोहरा अफवाहें फैलाकर
यह जुदा इक मसअला है

अंजुमन में
असलियत के साथ
आज मुझे
आ जाएँगे
इनको बुरा लगा
उसको मैं अच्छा लगता था
क्यों करते हैं मेहनत
किस्सा नहीं हूँ
कोई बात हुई
ग़ज़लों में रंग
जो गया
डर में था
तितलियाँ
तीर छूटा
तुम देखना
तौबा तौबा
दर्द को इतना जिया
दासी बना के मारा
पागलों की इस कदर
बह गया मैं
बाबा
बोलता बिलकुल नहीं था
मौत की वीरानियों में
मंज़िलों की खोज में
रोज़ का उसका
लड़केवाले लड़कीवाले
लोग कैसे ज़मीं पे
सच कहता हूँ
सोचना
हो गए सब कायदे

महिला दिवस पर विशेष
स्त्री थी कि हँस रही थी
हमारी किताबों में हमारी औरतें

 

तितलियाँ

कितनी उम्मींदें लगाकर आ गई फिर तितलियाँ
काग़ज़ी फूलों से धोखा खा गई फिर तितलियाँ

मैंने सोचा फूल बन महकूँ जो उनकी राह में
खुशबू बन ख़्वाबों में मेरे छा गई फिर तितलियाँ

'एक दिल बच्चों के जैसा है तुम्हारी खोज में'
इतना सुनना था कि बस शरमा गईं फिर तितलियाँ

क़ुदरती तानों की रौ में मैं जो इक दिन बह चला
मेरे सुर में सुर मिला कर गा गई फिर तितलियाँ

इस चमन से उस चमन इस फूल से उस फूल तक
ज़िंदगी के बीज कुछ बिखरा गई फिर तितलियाँ

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