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अनुभूति में संजय ग्रोवर की रचनाएँ

नई ग़ज़लें--
उसे अपने दिल में
जब भी लोगों से मिलता हूँ
दिन हैं क्या बदलाव के
भेद क्या बाकी बचा है
मोहरा अफवाहें फैलाकर
यह जुदा इक मसअला है

अंजुमन में
असलियत के साथ
आज मुझे
आ जाएँगे
इनको बुरा लगा
उसको मैं अच्छा लगता था
क्यों करते हैं मेहनत
किस्सा नहीं हूँ
कोई बात हुई
ग़ज़लों में रंग
जो गया
डर में था
तितलियाँ
तीर छूटा
तुम देखना
तौबा तौबा
दर्द को इतना जिया
दासी बना के मारा
पागलों की इस कदर
बह गया मैं
बाबा
बोलता बिलकुल नहीं था
मौत की वीरानियों में
मंज़िलों की खोज में
रोज़ का उसका
लड़केवाले लड़कीवाले
लोग कैसे ज़मीं पे
सच कहता हूँ
सोचना
हो गए सब कायदे

महिला दिवस पर विशेष
स्त्री थी कि हँस रही थी
हमारी किताबों में हमारी औरतें

 

जो गया

जो गया उससे निकलना चाहता हूँ
आते लम्हों में धड़कना चाहता हूँ

मेरा दुख लाएगा सुख तेरे लिए
मुझको करने दे जो करना चाहता हूँ

प्यार से भर दो मेरा जामे-हयात
हश्र तक भर कर छलकना चाहता हूँ

जान जाए प्यार गर जी भर मिले
ऐसी सूली पर लटकना चाहता हूँ

ये भी सच्चाई है पर कैसे कहूँ
तुझसे मैं बचके निकलना चाहता हूँ

मंज़िलों को पाके ही समझा हूँ ये
मैं अभी कुछ दिन भटकना चाहता हूँ

16 जनवरी 2006

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