अनुभूति में
ओम नीरव
की रचनाएँ

अंजुमन में-
गजल क्या कहें
छलूँगा नहीं
जिया ही क्यों
फागुनी
धूप में
हंस हैं काले
गीतों में-
धुंध के उस पार
पल पल पास बनी ही रहती
पाँखुरी पाँखुरी
माटी तन है मेरा
वही कहानी

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धुंध के उस पार
इस जगत की
जीत से तो भली लगती हार
इसलिए आओ चलें इस धुंध के
उस पार
देह दलदल
में फसे हैं साधना के पाँव
दूर काफी दूर लगता साँवरे का गाँव
क्या उबारेंगे कि जिनके दलदली
आधार
इसलिए आओ चलें इस धुंध के
उस पार
पल अतिथि
पल भर ठहर कर लूँ तनिक सत्कार
हाय निर्मम चल दिया तू हो लिया उसपार
है जहाँ पल भी न अपना क्या करें
मनुहार
इसलिए आओ चलें इस धुंध के
उस पार
भूत और
भविष्य की युग-संधि यह संसार
और जिस में जी रहे वह वर्तमान असार
मैं निरंतर ही ठगा जाता रहा
इसपार
इसलिए आओ चलें इस धुंध के
उस पार
साथ जीवन
के निरंतर मृत्यु का संवाद
धर्म ज्यों कुरु-क्षेत्र से उभरा हुआ भय-नाद
नाद में 'नीरव' मिलन की कामना
बेकार
इसलिए आओ चलें इस धुंध के
उस पार
२७ मई ३०१३
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