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नयी रचनाओं में-
ऐसे क्षण आए
खो गई है सृष्टि
झंकृत धरती आकाश
बाहर के मधुबन से
सब कुछ भूला

गीतों में-
अकथ्य को कहने का अभ्यास
आत्म-पुनर्वास भी जियें
आनन्द-छन्द मेरे
घर में भी सम्मान मिला है
ज्वार के झूले पड़े हैं
जन्मान्तर यात्राएँ की हैं
मौन टूटा छंद में
तय न हो पाया
देने को केवल परिचय है
देह मुक्ति मिल गयी मुझे
मरने से क्या होगा
मैं जीवन हूँ
शब्द के संचरण में
स्वीकार लिया भुजबन्ध
सावन में

‘सुनामी’ ज्वार रह गया हूँ

संकलन में-
होली है- अनुबंध लिखूँ
वर्षा मंगल- अब की
बरखा

 

 

शब्द के संचरण में

मैं अरुण अभियान के अन्तिम चरण में हूँ।
शब्द के कल्पान्त-व्यापी
संचरण में हूँ।

सूर्य की
शिखरान्त यात्रा पर चला हूँ मैं,
एक रक्षा-चक्र में नख-शिख ढला हूँ मैं,
मैं त्रिलोचन-स्वप्नवाही
जागरण में हूँ।

शशि-वलय
तोड़ा प्रखर गति की चपलता ने,
तृप्ति दे-दी सोम-रस डूबी तरलता ने,
मैं प्रणय से, प्रणव के
हस्तान्तरण में हूँ।

राग-रंजित
मन धुला आकाश-गंगा में,
घुल गया हिमखण्ड-सा संत्रास गंगा में,
मैं महासंक्रान्ति-क्षण के
सन्तरण में हूँ।

काल की
आद्यन्त गाथा, शून्य गाता है,
प्राण-परिचित नाद मुरली-सी बजाता है,
मैं अनादि-अनन्त लय के
व्याकरण में हूँ।

गीत मेरे
गूँजते-मिलते ध्रुवान्तों में,
मैं मुखर हूँ, ज्वालमण्डित समासान्तों में,
मैं समूची सृष्टि के
रूपान्तरण में हूँ।

४ फरवरी २०१३

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