अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

अनुभूति में रामस्वरूप सिंदूर की रचनाएँ— 

नयी रचनाओं में-
ऐसे क्षण आए
खो गई है सृष्टि
झंकृत धरती आकाश
बाहर के मधुबन से
सब कुछ भूला

गीतों में-
अकथ्य को कहने का अभ्यास
आत्म-पुनर्वास भी जियें
आनन्द-छन्द मेरे
घर में भी सम्मान मिला है
ज्वार के झूले पड़े हैं
जन्मान्तर यात्राएँ की हैं
मौन टूटा छंद में
तय न हो पाया
देने को केवल परिचय है
देह मुक्ति मिल गयी मुझे
मरने से क्या होगा
मैं जीवन हूँ
शब्द के संचरण में
स्वीकार लिया भुजबन्ध
सावन में

‘सुनामी’ ज्वार रह गया हूँ

संकलन में-
होली है- अनुबंध लिखूँ
वर्षा मंगल- अब की
बरखा

 

 

 

देने को केवल परिचय है

मैं ऐसा दानी हूँ, जिस-पर देने को केवल परिचय है।

मैं संयम के कारा-गृह से भागा हुआ एक बन्दी हूँ,
और, दूसरी ओर काम का जाना-माना प्रतिद्वन्दी हूँ,
मुझ को प्यार शरण दे बैठा, मन की जाने किस उलझन में,
बीत रहे दिन रूपमहल के इस गुलशन में, उस गुलशन में,
यह जग राजकुँवर कहता है,
पर, जीवन उलटा बहता है,
कठिन भूमिका मुझे मिली है, किन्तु सफल मेरा अभिनय है।

एक चोट थी, जो दर्पण को घर से निष्कासित कर बैठी,
एक चोट, दरके दर्पण से आनन उद्भाषित कर बैठी,
कीमत घटती-बढ़ती रहती, रंक या-कि सम्राट सभी की,
लेकिन मैं हूँ, कीमत जिस की निर्धारित हो चुकी कभी की,
अपना भी परिवार बड़ा था,
सत्ता का थोड़ा झगड़ा था,
राजी और खुशी से मुझ को बँटवारे में मिला हृदय है।

दुर्दिन ने वह चाल चली है, साँप मरे औ‘ लकुटि न टूटे,
जो मुझ-बिन आकुल रहते थे, एक-एक कर साथी छूटे,
सात समन्दर पार किये हैं, पर ओझल है अभी किनारा,
एक और सागर बन बैठा, प्राणवान सन्तरण बिचारा,
अथ-इति के सुनसान भवन में,
आँधी-पानी वाले क्षण में,
देख रहा हूँ साहस मेरा, कमसिन होकर भी निर्भय है।

४ फरवरी २०१३

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter