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नयी रचनाओं में-
ऐसे क्षण आए
खो गई है सृष्टि
झंकृत धरती आकाश
बाहर के मधुबन से
सब कुछ भूला

गीतों में-
अकथ्य को कहने का अभ्यास
आत्म-पुनर्वास भी जियें
आनन्द-छन्द मेरे
घर में भी सम्मान मिला है
ज्वार के झूले पड़े हैं
जन्मान्तर यात्राएँ की हैं
मौन टूटा छंद में
तय न हो पाया
देने को केवल परिचय है
देह मुक्ति मिल गयी मुझे
मरने से क्या होगा
मैं जीवन हूँ
शब्द के संचरण में
स्वीकार लिया भुजबन्ध
सावन में

‘सुनामी’ ज्वार रह गया हूँ

संकलन में-
होली है- अनुबंध लिखूँ
वर्षा मंगल- अब की
बरखा

 

झंकृत धरती-आकाश

झंकृत धरती-आकाश
प्राण के तार छू दिये प्राणों ने

अनुगुंजित अन्तर की घाटी
नर्तित चलती-फिरती माटी
बाँसुरी बनी नि:श्वास
प्राण के तार छू दिये प्राणों ने

जैसे हो वन्दन की वेला
अर्चन-अभिनन्दन की वेला
मुखरित निर्जन अधिवास
प्राण के तार छू दिये प्राणों ने

सुधियों ने अवगुण्ठन खोले
किसलय दल-सा संयम डोले
करुणा विगलित उल्लास

१ फरवरी २०१६

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