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नयी रचनाओं में-
ऐसे क्षण आए
खो गई है सृष्टि
झंकृत धरती आकाश
बाहर के मधुबन से
सब कुछ भूला

गीतों में-
अकथ्य को कहने का अभ्यास
आत्म-पुनर्वास भी जियें
आनन्द-छन्द मेरे
घर में भी सम्मान मिला है
ज्वार के झूले पड़े हैं
जन्मान्तर यात्राएँ की हैं
मौन टूटा छंद में
तय न हो पाया
देने को केवल परिचय है
देह मुक्ति मिल गयी मुझे
मरने से क्या होगा
मैं जीवन हूँ
शब्द के संचरण में
स्वीकार लिया भुजबन्ध
सावन में

‘सुनामी’ ज्वार रह गया हूँ

संकलन में-
होली है- अनुबंध लिखूँ
वर्षा मंगल- अब की
बरखा

 

 

सावन में

मैं अपने ही अधर चूम लूँ दरपन में
यह कैसा पानी बरसा इस सावन में

अधरों पर धर गया बाँसुरी
लीलाधर बादल कोई
मैं जितना जागा जागा
संसृति उतनी सोयी सोयी

बिजली कौंधे आग लगे चंदन वन में
यह कैसा पानी बरसा इस सावन में

आँखों की झील में तैरता
सपना एक शिकारे सा
तन की घाटी में बजता है
भीगा मन इकतारे सा

प्राणों में साकेत प्राण वृंदावन में
यह कैसा पानी बरसा इस सावन में

खारे सागर में उभरी
तल तक डूबी सरिताएँ
महा मौन में अनुगुंजित
आदिम यौवन की कविताएँ

होना है नौका विहार जल प्लावन में
यह कैसा पानी बरसा इस सावन में

७ मार्च २०११

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