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गीतों में-
अपने हर अस्वस्थ समय को
क्या कहेंगे लोग
करतूतों जैसे ही
काशी साधे नहीं सध रही
किसकी कुशलक्षेम पूछें
खून का आँसू
पानी उछाल के
प्रार्थना गीत
फिर कब आएंगे
महाकाल के इस प्रवाह में
लगने जैसा
शामिल कभी न हो पाया मैं
हम तुम
हो न सके हम

 

करतूतों जैसे ही

करतूतों जैसे ही सारे काम हो गये
किष्किंधा में लगता -
अपने राम खो गये

बालि और सुग्रीवों से कुछ -
कहा न जाये,
न्याय मांगते -
शबरी, शम्बूकों के जाये
करे धरे सब हवन, होम भी
हत्या और हराम हो गये

स्वप्नों सूझों की जड़ में ही -
दिग्गज मठ्ठा डाल रहे हैं,
और अस्मिता पर अपनी ही
कीचड़ लोग उछाल रहे हैं
देश देश के क्षत्रप मिलकर -
आज केन्द्र से बाम हो गये

देनदारियों का मत पूछो,
डेवढ़ी बैठेंगी आवक से
फिर भी पड़े हैं पीछे
राम हमारे, मृग शावक के
वर्तमान रिस रहा सिरे से -
गत, आगत बदनाम हो गये

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