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गीतों में
अपने हर अस्वस्थ समय को
क्या कहेंगे लोग
करतूतों जैसे ही
काशी साधे नहीं सध रही
किसकी कुशलक्षेम पूछें
खून का आँसू
पानी उछाल के
प्रार्थना गीत
फिर कब आएंगे
महाकाल के इस प्रवाह में
लगने जैसा
शामिल कभी न हो पाया मैं
हम तुम
हो न सके हम

 

हो न सके हम

हो न सके हम
छोटी सी ख्वाहिश का हिस्सा
हो न सके हम बदन उधारे बच्चों जैसा
गर्मी या बारिश का हिस्सा

हुआ न मनुवां
किसी गैर की महफिल का गायक साज़िंदा,
अपने ही मौरूसी घर का
रहा हमेशा से कारिंदा
दास्तान हो सके न रोचक
याकि लोक में प्रचलित किस्सा

जीवन जीने की कोशिश में
लगा रहा मैं भूखा-प्यासा
होना था कविता सा, लेकिन
हो न सका मैं ढंग की भाषा
जनम जनम से
होता आया
इन-उन की ख्वाहिश का हिस्सा

जीवन बांध नहीं पाये हम
मंसूबे ही रहे बांधते,
खुलकर खेल न पाये बचपन
यों ही खिचड़ी रहे रांधते
हो न सके
जीवन जीने की
हम आदिम ख्वाहिश का हिस्सा

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