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हाइकु में-
सर्दी की धूप

छंदमुक्त में-
अनसुनी आवाज़
गरमी की एक दोपहर
घर
धूप
प्रतीक्षा
बसंत
मेरी कहानी
मौन प्रतीक
लहरों का गाँव
सीमित दायरे

संकलन में-
जग का मेली- जुगनू
नया साल- नव वर्ष के कोरे पन्नों पर
वर्षा मंगल- बचपन का सावन
वसंती हवा- बासंती सपने
होली है- होली कुछ चित्र

 

धूप

जाड़े की दुपहर में
सीली दीवारों से सटी है धूप,
सायों से अठखेलियाँ कर रही
बच्चों के हाथ से मैली हो गई है धूप,
विभिन्न आकारों में कैद हुई
छोटी-छोटी उँगलियों से झाँकती है धूप,
कच्ची, गीली माटी में झोपड़ी पर पैबंद लगाती
ज़मीन पर मखमली कंबल बन जाती है धूप,
खिड़की से छन-छन के आती
ठिठुरे हाथों को अलाव का ताप दे जाती है धूप,
आसमान से बिखरती, ज़िंदगी की नौटंकी में
कभी राजा कभी रंक बनी है धूप,
सुख-दुख की परिभाषा में
मौन अभिव्यक्ति बनी है धूप,
सुबह को हौले से आती है
रात सब बटोर कर, चली जाती है ये धूप।

२४ सितंबर २००७

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