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माणिक
स्पर्श

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अमावस को
अवशेष
इश्क
एक अंतिम रचना
कुछ निशान वक्त के
ख़यालों में
ओस की एक बूँद
गीत गाती
मुट्ठी भर
विस्मृत
स्तब्ध
सनन-सनन स्मृतियाँ
सार्थकता

 

माणिक

सपनों के सपाट कैनवास पर
रेखाएँ खींचता
असीम स्पर्श तुम्हारा
कभी झिंझोड़ता
कभी थपथपाता
कुछ खाँचे बनाता
आँकता हुआ चिह्नों को
रंगों से तरंगों को भिगोता रहा
एक रात का एक मखमली एहसास।

कच्ची पक्की उम्मीदों में बँधा
सतरंगी सा उमड़ता आवेग
एक छलकता, प्रवाहित इंद्रधनुष
झलकता रहा गली-कूचों में
बिखरी सियाह परछाइयों
के बीच कहीं दबा दबा।

रात रोशन थी
श्वेत चाँदनी सो रही थी मुझमें
निष्कलंक!
अँधेरों की मुट्ठी में बंद
जैसे माणिक हो सर्प के
फन से उतरा हुआ।
सुबह का झुटपुटा
झुकती निगाहों में
बहती मीठी धूप
थम गया दर्पण दिन का
अपने अक़्स में गुम होता हुआ।

और तब
थका-हारा, भुजंग सा
दिन का यह सरसराता धुँधलका
सरकता रहा परछाइयों में प्रहर-प्रहर।
नींद में डूबी अधखुली आँखों के बीच
फासलों को निभाता यों दरबदर
साथ चलता रहा मेरे
एकटक आठों प्रहर।

१ मार्च २०१६

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