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स्तब्ध
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ओस की एक बूँद

ओस में डूबता अंतरिक्ष
विदा ले रहा है
अँधेरों पर गिरती तुषार
और कोहरों की नमी से।

और यह बूँद न जाने
कब तक जियेगी
इस लटकती टहनी से
जुड़े पत्ते के आलिंगन में।

धूल में जा गिरी तो फिर
मिट के जाएगी कहाँ?

ओस की एक बूँद
बस चुकी है कब की

मेरे व्याकुल मन में।

२५ अगस्त २००८   

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