अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

अनुभूति में मीना चोपड़ा की कविताएँ-

नई रचनाओं में-
अमावस को
इश्क
एक अंतिम रचना
कुछ निशान वक्त के
ख़यालों में
मुट्ठी भर
सार्थकता

कविताओं में-
अवशेष
ओस की एक बूँद
गीत गाती
विस्मृत
स्तब्ध
सनन-सनन स्मृतियाँ

 

विस्मृत

धूल थी
कपड़ों पर जमी
कितनी आसानी से
झड़ गई मैं
चेतना के हाथों
झटकने मात्र से
मिट्टी में भर गई मैं।
असहाय से गुनाहों
मैं गढ़ी उलझन बनकर
एक काले चिराग के
गहरे कुएँ में बंद
दम भरती हुई
अँधेरों को अँधेरों से
जोड़ती चली गई।
कहीं अच्छा होता -
सिर्फ़ कुछ समय के लिये
अचेतन में
चेतन का ईंधन रख
एक छोटा सा जुगनू
सुलगा देते तुम –
हलका सा मुझको
अपने में जला लेते तुम
मीठी सी नींद में मुझको
सुला देते तुम
अचिर ही सही –
कुछ तो बिसात होती
कहीं कोई आस –
चाहे मिट्टी के साथ होती।

२५ अगस्त २००८   

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter