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किसी फरेब से
तसव्वुर में तेरा चेहरा
दिल दुखाता है
हर नफस को खिताब

अंजुमन में-
उसी फिजां में
देखते हैं
नस्ले-आदम
शब का सुकूत
सुनहरी धूप का मंजर

 

देखते हैं

चलो मंजर बदल कर देखते हैं
किसी पत्थर में ढलकर देखते हैं

कहाँ तक साथ देगी नामुरादी
इसी के साथ चल कर देखते हैं

यक़ीनन खुद-ब-खुद बदलेंगे चेहरे
बस इक शीशा बदल कर देखते हैं

सदा कायम रहेंगे  क्या उजाले
अगर यह है तो चलकर देखते हैं

खुद अपने झूठ की तरदीद करके
इसे सच में बदलकर देखते हैं

जहाँ अहले-वफा ने सर रखे थे
उन्हीं राहों पे चलकर देखते हैं

समय की तेज रफ्तारी से आगे
नदीम अब हम निकलकर देखते हैं

१४ जून २०१०

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