अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

अनुभूति में राजीव राय  की रचनाएँ—

नई रचनाएँ-
ज़िंदगी आँच से
जिसने थामीं थीं
पूरी हो आखिर कैसे
ये जहाँ
हम उदास रहते हैं

अंजुमन में—
चाहा था जिसे हमने
पूछूँ मैं भला कैसे
बरसों निभाया
शाम से उदासी
हज़ारों नेकिया

  बरसों निभाया

बरसों निभाया जिनसे, मिलते नहीं ख़ुशी से
ऐसे में याद आए, कुछ लोग अजनबी से

शोहरत तो बेवफ़ा है, रहती है पास किसके
शिकवा नहीं है कोई, गुमनाम ज़िंदगी से

गुरबत के अंधेरों में, गुज़री है ज़िंदगानी
दिल चौंक-सा जाता है, दौलत की रौशनी से

क्यों लोग सुनाते हैं, एहसान के फसाने
कुछ भी तो नहीं चाहा, मैंने कभी किसी से

ढूँढ़ा हज़ार लेकिन, मिलती नहीं वो दुनिया
रहते हों लोग जिसमें, मासूम आदमी से

इस सच को समझने में, कुछ देर तो लगती है
मतलब के बिना कोई, मिलता नहीं किसी से

२१ सितंबर २००९

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter