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अनुभूति में श्रीधर आचार्य शील की रचनाएँ-

अंजुमन में-
क्या जमाना आ गया है
झरने लगे हैं
नफरत के जो भाव भरे हैं
मेरे जीवन की बगिया
रात खड़ी है

गीतों में-
इक छोटा सा अंतराल
कुछ दिन बीते
तुमने कर दिया सही
यह कैसा अनुबंध
 

नफरत के जो भाव भरे हैं

नफरत के जो भाव भरे हैं
ये सब उनके किये धरे हैं

होता रंग न साँच-झूठ का
कैसे कह दें कौन खरे हैं

खामोशी से सहते हैं सब
घाव अभी तक नही भरे हैं

बीच भँवर में फँसी जिंदगी
नाविक बिन पतवार डरे हैं

नयनों में थे जिनके सपने
आँसू बनकर आज झरे हैं

प्यार बाँटता जो जीवन में
सभी उसे भी प्यार करे हैं

१ दिसंबर २०२२

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अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

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