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अनुभूति में श्रीधर आचार्य शील की रचनाएँ-

अंजुमन में-
क्या जमाना आ गया है
झरने लगे हैं
नफरत के जो भाव भरे हैं
मेरे जीवन की बगिया
रात खड़ी है

गीतों में-
इक छोटा सा अंतराल
कुछ दिन बीते
तुमने कर दिया सही
यह कैसा अनुबंध
 

क्या जमाना आ गया है

क्या जमाना आ गया है लोग सारे छल रहे हैं
आस में जो रोशनी के साथ उनके चल रहे हैं

हाशिये पर जिंदगी है टूटता विश्वास हर पल
साथ सूरज के सभी हैं पर अँधेरे पल रहे हैं

पत्थरों का ये शहर है मिट रही संवेदनाएँ
है हमें मालूम फिर भी प्रश्न सब हल कर रहे हैं

नाव कागज की बनी है तेज जल की धार भी है
डूबने की हर अदा पर भी अमल हम कर रहे हैं

चाहता है आदमी जो वो भला मिलता कहाँ है
बन न पाये आज मोती ओस बनकर ढल रहे हैं

आग जिसने है लगाई फूल था अपने चमन का
सो रहा है बेखबर वो लोग सारे जल रहे हैं

चेतना तो सृष्टि का सौंदर्य है आधार भी है
खो रहे हैं हम उसे भी और आँखें मल रहे हैं

१ दिसंबर २०२२

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