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अनुभूति में गोपाल दास नीरज की रचनाएँ-

दोहों में-
नीरज के दोहे

गीतों में-
कारवाँ गुज़र गया
खग उड़ते रहना जीवन भर
छिप छिप अश्रु बहाने वालों
धरा को उठाओ
नीरज गा रहा है
बसंत की रात
मुझको याद किया जाएगा
लेकिन मन आज़ाद नहीं है
साँसों के मुसाफ़िर

संकलन में-
ज्योति पर्व-जलाओ दिये
दिये जलाओ-तुम दीवाली बन कर

अंजुमन में-
दूर से दूर तलक

  बसंत की रात

आज बसंत की रात,
गमन की बात न करना

धूप बिछाए फूल–बिछौना,
बग़िया पहने चांदी–सोना,
कलियां फेंके जादू–टोना,
महक उठे सब पात,
हवन की बात न करना
आज बसंत की रात,
गमन की बात न करना

बौराई अंबवा की डाली,
गदराई गेहूं की बाली,
सरसों खड़ी बजाए ताली,
झूम रहे जल–पात,
शयन की बात न करना
आज बसंत की रात,
गमन की बात न करना।

खिड़की खोल चंद्रमा झाँके,
चुनरी खींच सितारे टाँके,
मन करूं तो शोर मचाके,
कोयलिया अनखात,
गहन की बात न करना
आज बसंत की रात,
गमन की बात न करना।

निंदिया बैरिन सुधि बिसराई,
सेज निगोड़ी करे ढिठाई,
तान मारे सौत जुन्हाई,
रह–रह प्राण पिरात,
चुभन की बात न करना
आज बसंत की रात,
गमन की बात न करना।

यह पीली चूनर, यह चादर,
यह सुंदर छवि, यह रस–गागर,
जनम–मरण की यह रज–कांवर,
सब भू की सौग़ात,
गगन की बात न करना
आज बसंत की रात,
गमन की बात न करना।

९ मार्च २००६

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