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ज्योति पर्व
संकलन

 

जलाओ दिये

जलाओ दिये पर रहे ध्यान इतना
अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए

नई ज्योति के धर नये पंख झिलमिल,
उड़े मर्त्य मिट्टी गगन-स्वर्ग छू ले,
लगे रोशनी की झड़ी झूम ऐसी,
निशा की गली में तिमिर राह भूले,
खुले मुक्ति का वह किरण-द्वार जगमग,
उषा जा न पाए, निशा आ ना पाए।

जलाओ दिये पर रहे ध्यान इतना
अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए

सृजन है अधूरा अगर विश्व भर में,
कहीं भी किसी द्वार पर है उदासी,
मनुजता नहीं पूर्ण तब तक बनेगी,
कि जब तक लहू के लिए भूमि प्यासी,
चलेगा सदा नाश का खेल यों ही,
भले ही दिवाली यहाँ रोज आए।

जलाओ दिये पर रहे ध्यान इतना
अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए

मगर दीप की दीप्ति से सिर्फ़ जग में,
नहीं मिट सका है धरा का अँधेरा,
उतर क्यों न आएँ नखत सब नयन के,
नहीं कर सकेंगे हृदय में उजेरा,
कटेगे तभी यह अँधेरे घिरे अब
स्वयं धर मनुज दीप का रूप आए

जलाओ दिये पर रहे ध्यान इतना
अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए

- नीरज

  

 कलश भरे द्वारे-द्वारे

बादल छँटे
गई बरसातें
आई सुषमा की रानी
दिव्य दिवाली
दिये संजोती
गौरव की मुखरित वाणी
टपरे खिले
खिला घर-आँगन
लिपे पुते प्यारे-प्यारे
संस्कृतियों के
सदमतियों के
कलश भरे द्वारे-द्वारे
एक दिया है
जो जलता है
बुझ जाता है
मिले-जुले
त्योहार हुआ
एक समा-सा बन जाता है
निशा भले हो
अमा भले हो
उस पर भी आलोक रहे
नेह भरा हो
लौ जाग्रत हो
क्यों कोई फिर शोक रहे
आओ मिलें
आज सब खिलें
दीपों का त्योहार मनाएँ
गोधन पूजें
लक्ष्मी पूजें
प्राण प्राण में प्यार बढ़ाएँ

-शैवाल सत्याथी

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