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सेतु है कविता
 

 

सेतु है कविता

कविता कभी खिलाती है फूल
लाल हरे नीले पीले
फूलों से
भर देती है दामन
रच देती है इन्द्रधनुष
आँखों में उठते हैं
सपनो के
अनगिन जुगनु।
और कभी
कुलबुलाती आँतों और
सूनी आँखों से गुजरकर
रच देती है कुछ ऐसा
कि ...
हो जाता है
सब स्थगित।
बहने लगती है
पीड़ा की मन्दाकिनी
दुःख और सुख की
सेतु ही तो है कविता

१ फरवरी २०१८

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