अंजुमनउपहार कविकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्राम
गौरवग्रंथ दोहेरचनाएँ भेजेंनई हवा पाठकनामा पुराने अंकसंकलन
हाइकु हास्य व्यंग्यक्षणिकाएँदिशांतरसमस्यापूर्ति

 

अनुभूति में हरबंस सिंह अक्स की रचनाएँ-

अंजुमन में-
इश्क में फूल
चार क़तआत
देखने वालों
देखते ही देखते
बुतकदे में
 

 

कतआत -


आज मुरझा गए तो क्या गम है
हम शगुफ्ता गुलाब होते थे।
दिल की बातों में आ गए वरना
हम कहाँ यूं ख़राब होते थे।


ज़िंदगी के कुमारखाने में
देख तो क्या नसीब करता है
एक बनता है जब अमीर कोई
सैंकडों को गरीब करता है


नूर इक फैलता है धरती पर
फूल पाकीज़गी का खिलता है
पूरा आलम सँवर सँवर जाए
दिल से जब दिल कहीं भी मिलता है


बाप दादा भी झेलते गुज़रे
मैं भी गम ढो रहा हूँ कुछ ऐसे
एक मुफलिस के घर में पुश्तों तक
इक महाजन का क़र्ज़ हो जैसे

७ जुलाई २००८

इस कविता पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमनउपहारकविकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्रामगौरवग्रंथदोहेरचनाएँ भेजें
नई हवा पाठकनामा पुराने अंक संकलनहाइकुहास्य व्यंग्यक्षणिकाएँ दिशांतरसमस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इस में प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक माह की 1–9 –16 तथा 24 तारीख को परिवर्धित होती है।

website metrics