अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

अनुभूति में श्रीधर आचार्य शील की रचनाएँ-

अंजुमन में-
क्या जमाना आ गया है
झरने लगे हैं
नफरत के जो भाव भरे हैं
मेरे जीवन की बगिया
रात खड़ी है

गीतों में-
इक छोटा सा अंतराल
कुछ दिन बीते
तुमने कर दिया सही
यह कैसा अनुबंध
 

क्या जमाना आ गया है

क्या जमाना आ गया है लोग सारे छल रहे हैं
आस में जो रोशनी के साथ उनके चल रहे हैं

हाशिये पर जिंदगी है टूटता विश्वास हर पल
साथ सूरज के सभी हैं पर अँधेरे पल रहे हैं

पत्थरों का ये शहर है मिट रही संवेदनाएँ
है हमें मालूम फिर भी प्रश्न सब हल कर रहे हैं

नाव कागज की बनी है तेज जल की धार भी है
डूबने की हर अदा पर भी अमल हम कर रहे हैं

चाहता है आदमी जो वो भला मिलता कहाँ है
बन न पाये आज मोती ओस बनकर ढल रहे हैं

आग जिसने है लगाई फूल था अपने चमन का
सो रहा है बेखबर वो लोग सारे जल रहे हैं

चेतना तो सृष्टि का सौंदर्य है आधार भी है
खो रहे हैं हम उसे भी और आँखें मल रहे हैं

१ दिसंबर २०२२

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter