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अनुभूति में श्रीधर आचार्य शील की रचनाएँ-

अंजुमन में-
क्या जमाना आ गया है
झरने लगे हैं
नफरत के जो भाव भरे हैं
मेरे जीवन की बगिया
रात खड़ी है

गीतों में-
इक छोटा सा अंतराल
कुछ दिन बीते
तुमने कर दिया सही
यह कैसा अनुबंध
 

झरने लगे हैं

झरने लगे हैं देखो, जंगल सभी पवन सेस
इन्सानियत का धुआँ उड़ने लगा हवन से

नारों की आहुति में अक्षत हैं वायदों के
अपने ही कर दुखे हैं करते हुए नमन से

कोई लकीर सीधी खींची नहीं है जाती
जब भी कदम उठे हैं उल्टे पड़े चलन से

कल तक जो चीखते थे देते नहीं दिखाई
शायद वे चल दिये हैं होकर खफा भवन से

कब तक करें भरोसा ऊँटों के काफिलों का
मरुथल मे जो गए हैं कह अलविदा चमन से

१ दिसंबर २०२२

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