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अनुभूति में शैल अग्रवाल की रचनाएँ- 

छंदमुक्त में-
अतीत के खज़ानों से
अभिनंदन
अशांत
आदमी और किताब
उलझन
एक और सच
एक मौका
ऐसे ही
किरक
कोहरा
खुदगर्ज़
जंगल
नारी
देखो ना
नेति नेति
बूँद बूँद
मिटते निशान
ये पेड़
लहरें
सपना अभी भी

हाइकू में
दोस्त, योंही, आज फिर, जीवन, आँसू

संकलन में-
गाँव में अलाव–धुंध में
शुभकामनाएँ–पिचकारी यह
होली – होली हाइकू
गुच्छे भर अमलतास– आई पगली
                – कटघरे में
                - मुस्कान
                - ममता

पिता की तस्वीर– बिछुड़ते समय
ज्योति पर्व– तमसो मा ज्योतिर्गमय
                - दिया और बाती
                - धूमिल रेखा
जग का मेला– चार शिशुगीत
ममतामयी– माँ : दो क्षणिकाएँ

 

ये पेड़

ये पेड़ जड़ से
मटमैली धरती पकड़े
किस मोहपाश में बँधे खड़े
यों ही चुपचाप ––
गरमी–सरदी और बरसात
नई शाखों, नए पत्तों में सजी
लुभाती–रिझाती इनकी ललक
और बावरी फुनगियों की पुलक
सज–सँवर, सिहर–सिहर
छू आती सपनों का आकाश
उमंगों की शाखें फलती–फूलती
आतुर हो–हो बढ़ती जातीं
मदिर–मलय–सा बौराया मन
कर लेता फल–फूलों का श्रृंगार
और फिर तन की हरियाली
कलियों का यौवन
कर देते सब न्योछावर
लुट–लुटकर धरती पर
और झूमते इतराते
ये हँस–हँस
ले अपने हिस्से में बस
कुछ सूखी शाखें ––
कुछ चुभते काँटे –– ।

 

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