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अभिलाषा

कितने दिए क्यों न जलें हों
मिटे कैसे अँधेरा
कुछ जले-बुझे दीपों से भी
क्या होता कहीं सवेरा

जो नाद ह्रदय से उठा नहीं
पीड़ा देकर कुछ रह गई
अब विस्मृत हो ऐसे चली
जैसे कुछ था हुआ नहीं

क्या गगन से गिरती ओस की एक बूँद
विलीन होती स्वछ सागर से
कुछ बूँद तो यूँ हीं रह जाती
मिलन के प्रणय-प्रलाप में

वह बूँद बहुत भाग्यशाली है
जो सीपी में गिर मोती बन जाती है
वरना सहस्त्रों बूंदों का भाग्य कहाँ
जो सीपी तक पहुँच पाती है

१३ सितंबर २०१०

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