अंजुमनउपहारकाव्य संगमगीतगौरव ग्राम गौरवग्रंथदोहे पुराने अंक संकलनअभिव्यक्ति कुण्डलियाहाइकुहास्य व्यंग्यक्षणिकाएँदिशांतर

अनुभूति में िज्ञासा सिंह की रचनाएँ-

गीतों में-
आँधियों की बस्तियों में
और बसंती ऋतु
भ्रम का झूला
समय से अनुबंध
हार में जीत
 

 

और बसंती ऋतु

सरगमी धुन और बसंती ऋतु
एकटक हूँ, हो गई हूँ बुत

झुंड में लहरों पे उड़ना, चहचहाना चोंच भरना
एक लय एक तान लेके, फ़लक पे जाके उतरना
झूमते-गाते परिंदे चल दिए मेरी नदी से,
नैन खोले मैं खड़ी हूँ
दृश्य है अद्भुत

कूकती कुंजों में कोयल, पीकहाँ बोला पपीहा,
डोलता मद में भ्रमर, मकरंद भरकर एक फीहा
पीत वस्त्रों में सुसज्जित ये धरा, इतरा रही है
हो गयी जैसे दिवानी
प्रेमरंग में धुत

खोल दी हर गाँठ ऋतु ने, दूर तक उजास है
दिख रहा है उस जहाँ तक, रंग और उल्लास है
धूप दे अपने परों को चेतना उनमें भरी है,
आज जीना चाहती हूँ
भाव ले अच्युत

१ सितंबर २०२३

 

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमनउपहारकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्राम गौरवग्रंथदोहेरचनाएँ भेजें
नई हवा पाठकनामा पुराने अंक संकलन हाइकु हास्य व्यंग्य क्षणिकाएँ दिशांतर समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter