अनुभूति में हरिशंकर
सक्सेना
की रचनाएँ—
गीतों में-
अग्निगर्भा
अब तो जागिये
तीखी हवाएँ आ गईं
विकलांग प्रश्न
सदी की भूल
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अब तो
जागिये
आ रहा है -
धुंध का सैलाब।
अब तो जागिये
आज घर की लाज चहुँदिश
कीचकों से त्रस्त है।
रहनुमाई राग-रंग की
वीथियों में मस्त है
हर सुरक्षा
लग रही है ख्वाब
अब तो जागिये
हर कदम पर खौफ़
पैराशूट से उतरा यहाँ
आस्तीनों में छुपे
गद्दार से ख़तरा यहाँ
दाँव पर
लगती वतन की आब
अब तो जागिये
मुस्कुराती गंध
नफ़रत की हवा में खो गई
आस्था भी गोधरा-सी
रक्तरंजित हो गई
रैलियों में
बँट रहा तेज़ाब
अब तो जागिये
२७ दिसंबर २०१०
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