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अनुभूति में
महेश केसरी
की रचनाएँ
छंदमुक्त
में-
अधेड़ होती प्रेमिका के
संशय
पिता का दुःख
पिता के हाथ की रेखाएँ
पिता पुराने दरख़्त की तरह होते हैं
पीठ पर बेटियाँ
सम्बंध |
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पीठ पर
बेटियाँ
काकी अक्सर कहा करतीं
कि बाप के पीठ पर बेटे ही होते हैं
और बेटे ही बनते हैं बाप का सहारा
बेटियाँ बाप के पीठ पर नहीं होतीं
और, ना ही वो बाद में बनतीं हैं बाप का सहारा
कि, बहू मुझे अबकी बेटा ही चाहिए
इसलिए भी कि वंश
आगे चल सके
और, थके- हारे, जले - भूने मर-मर के खेतों में
काम करने वाले बाप का सहारा आखिर
बेटे ही तो बनेंगे
बेटियाँ , फूल सी कोमल और सुकुमारी होतीं हैं
कहाँ - कहाँ बाप के साथ खेतों में जलेंगीं
फिर, बेटियाँ पराया धन
भी तो होती हैं
वो, बाप के पीठ पर नहीं होतीं
बाप के सीने में कील की तरह होतीं हैं..
कई देवी-थानों में
परसादी से लेकर, मुर्गा- मुर्गी, खस्सी-पठरु
गछती थीं काकी छुटकु के लिए
कुछ, सालों बाद छुटकु आया
काकी, नाचतीं- झूमतीं इतरातीं
माँ की बलैंयाँ लेतीं
माँ को अशीषतीं
दूधो नहाओ पूतो -फलो
यहाँ भी पूत ही फल रहें थें
और, बेटियाँ हो रहीं थीं होम
बहुत सालों बाद जब
छुटकु चला गया, परदेश, पढ़ने
और, काकी पडीं खूब बीमार
इतना बीमार, कि अपने से उठ भी ना पाती थीं
और अस्पताल था गाँव से कोसों दूर
तब, मैनें, अपनी पीठ पर
टाँग कर पहुँचाया था उनको अस्पताल
जब, काकी ठीक हो गईं
तो, काकी मुझे अशीषतीं
आँखों से झरते आँसू पोछतीं जातीं
पश्चाताप के आँसू
आँखों से मोतियों की तरह झरते जाते
इस, बात का अफसोस काकी को आजीवन रहा
कभी- कभी आत्मग्लानि से भरकर
मेरे बालों में हाथ फेरतीं
१ जूलाई २०२५ |