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अनुभूति में मुन्नी शर्मा की रचनाएँ-

अंजुमन में-
आज भी है
गूँगों की आवाज
पतझड़ भी लिख
बंदिशों को तोड़कर
शायरी अपना शगल

 

शायरी अपना शगल

शायरी अपना शग़ल अच्छा लगा
भीड़ से तन्हा सफ़र अच्छा लगा

मुश्किलों में जल गया सारा गुरूर
हसरतों का वो हवन अच्छा लगा

आँसुओं ने मैल दिल का धो दिया
नेमतों सा पाक ग़म अच्छा लगा

कोंपलों ने सिर झुकाकर यों कहा
बीज माटी में दफ़न अच्छा लगा

बस यहीं जन्नत यहीं मुल्के अदन
अपना घर अपना वतन अच्छा लगा

खुशबुएँ दीवार फाँदे आ गईं
दुश्मनों का भी चमन अच्छा लगा

छन रही है छप्परों से चाँदनी
झोपड़ी का यह महल अच्छा लगा

सुन रहा खामोश मेरी इल्तिजा
बुत बना पत्थर सनम अच्छा लगा

उम्र भर ढोते रहे दामन के दाग
मौत पर उजला कफ़न अच्छा लगा

९ दिसंबर २०१३

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