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जो है होनेवाला
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आने वाले कल पर सोचो
औरत खुलती है
कथा कहें
कमीज़ के नीचे
काशी की गलियाँ
ख्वाबों के नए मेघ
खुसरो नहीं गुज़रती रैन
जीने के भी कई बहाने
दरी बिछाकर बैठें
नींद में जंगल
पोरस पड़ा घायल
बात से आगे

हुसैन के घोड़े

 

काशी की गलियाँ

ये बसरे के मोती छिटके
या जूही की कलियाँ हैं।
कसे हुए दाने हैं भीतर
हरी मटर की फलियाँ हैं।।

अटक-अटक कर किसी मोड़ से
लौट वहीं पर आते हैं,
तिरछे-बाँके मोड़ हमें ये
बार-बार भटकाते हैं
ये आँखों के पतले डोरे
या काशी की गलियाँ हैं।।

रंग बज रहे खुली हवा में
सरसों हिलती है
कहीं-कहीं पर धूप से ज़्यादा
छाया खिलती है
जुड़ी हथेली और बीच में
उड़ती हुई तितलियाँ हैं।।

मौसम की रंगीन इबारत
इन्हें ठीक से पढ़ना है
इंद्रधनुष कुछ नए रंग के
आसमान में गढ़ना है
कसी गाँठ को खोल रहीं फिर
परिचित वही उँगलियाँ हैं।।

९ जून २००७

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