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आने वाले कल पर सोचो
औरत खुलती है
कथा कहें
कमीज़ के नीचे
काशी की गलियाँ
ख्वाबों के नए मेघ
खुसरो नहीं गुज़रती रैन
जीने के भी कई बहाने
दरी बिछाकर बैठें
नींद में जंगल
पोरस पड़ा घायल
बात से आगे

हुसैन के घोड़े

 

जीने के भी कई बहाने

पावस का घन
टूट रहा है

ये बादल के लटके झटके
सागर की आँखों में खटके
ये पानी है ये बिजली है
शीशे के दरवाजे चिटके
सहम रहा है पक्का घर यह
कुछ तो है
जो छूट रहा है

रात रात भर नीम जगी है
भरी दोपहरी आँख लगी है
जीभों पर हैं स्वाद ठिठकते
ये स्वादों की अजब ठगी है
टहनी भारी होकर हिलती
शायद कल्ला
फूट रहा है

हिला बाँध छू गई नदी है
हल्दी अक्षत बदी सुदी है
बाजारों में लुट जाते हैं
कुछ उधार कुछ नकदी है
सोई गुमटी
लूट रहा है

बिखरे हैं सरसों के दाने
साँसें बिखरी हैं सिरहाने
जीने वाले जी लेते हैं
जीने के भी कई बहाने
दिन तो पहले जैसा बैठा
तिल छाती पर
कूट रहा है।

१९ अक्तूबर २००९

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