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भय का लभेरा
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मेरा यूटोपिया

संकलन में-
वसंती हवा-फूले फूल पलाश

हिंदी की सौ सर्वश्रेष्ठ प्रेम कविताएँ-थके नयन में सुबह

` भय का लभेरा

कसे हर मस्तिष्क को
भय का लभेरा है
जो सुनाई दे रहा, वह
स्वर न मेरा है!

हिचकिचाहट से भरी
झरती उदासी है
कंठ में फँस गई
कड़वाहट धुँए की है

एक बटुरी धूप
खाँची भर अंधेरा है!

पर-कटे वनपाखियों की
फड़फड़ाहट-सा
क्षीण बेवा नाजनीं की
मुस्कुराहट-सा

भार के सिर पर चढ़ा
बेसुध उबेरा है!

ठूँठ हर अहसास की
लग रही शाखें हैं
या रतौंधी से
हुई कमज़ोर आँखें हैं

एक घर में
साँप-नेउर का बसेरा है!

४ जनवरी २०१०

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