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अनुभूति में कुमार रवींद्र की रचनाएँ

नए गीत-
एक बच्चे ने छुआ
काश! पढ़ पाते
धुर बचपन की याद
बोल रहा घर

गीतों में
अपराधी देव हुए

इसी गली के आखिर में
और दिन भर...

खोज खोज हारे हम
गीत तुम्हारा

ज़रा सुनो तो
पीपल का पात हिला
बहुत पहले
मेघ सेज पर
वानप्रस्थी ये हवाएँ
शपथ तुम्हारी
संतूर बजा
सुनो सागर
हम नए हैं

हाँ सुकन्या

 

ज़रा सुनो तो

ज़रा सुनो तो
घर-घर में अब गीत हमारे
गूँज रहे हैं!

यहाँ चिता पर हम लेटे
हैं धुआँ हो रहे
और देह के कष्ट हमारे
सभी खो रहे

पार मृत्यु के
हम जीवन की नई पहेली
बूझ रहे हैं!

मंत्र रचे थे
हमने धरती के सुहाग के
जो साँसों में दहती हर पल
उसी आग के

उन्हीं अनूठे
मंत्रों से सब नए सूर्य को
पूज रहे हैं!

अंतिम गीत हमारा यह
रह गया अधूरा
हाँ, कल लौटेंगे हम
इसको करने पूरा

काला द्वीप पर
नए-नए सुर-ताल हमें अब
सूझ रहे हैं!

1 मई 2007

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