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नए गीतों में-
अंधा दर्पन
गीत होंगे

मौत का कुआँ
रामधनी की माई
हमको सब सहना है

दोहों में-
सरिता के कूल

गीतों में-
कितनी बार
गयाप्रसाद
बाजार घर में
बाजीगर मौसम
बाँसुरी की देह दरकी
देखता हूँ इस शहर को
नवगीत के अक्षर
मदारी की लड़की
रोज नया चेहरा
वाल्मीकि व्याकुल है
समय काटना है

 

देखता हूँ इस शहर को

रोज़ जीते, रोज़ मरते
उम्र यों ही कट रही है
सीढ़ियाँ चढ़ते-उतरते!

फिर कपोतों की उमीदें
आँधियों में फँस गई है
बया की साँसे कहीं पर
फुनगियों में कस गई है

यहाँ तोते बाज से मिल
पंछियों के पर कतरते!

कंपकपांते होठ नाहक
थरथराती देह है
और कुर्ते पर चढ़ा बस
इस्तरी-सा नेह है

पूछिए मत हाल बस
हर हाल में सजते-सँवरते!

लूटकर लाए पतंगे
लग्गियों से जो यहाँ
कैद उनकी मुट्ठियों में
आजकल दोनों जहाँ

कुछ धुआँते पेड़
उन पगडंडियों की याद करते!

७ जनवरी २००८

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