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गीतों में-
कितनी बार
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बाजीगर मौसम
बाँसुरी की देह दरकी
देखता हूँ इस शहर को
नवगीत के अक्षर
मदारी की लड़की
रोज नया चेहरा
वाल्मीकि व्याकुल है
समय काटना है

 

हमको सब सहना है

तट हैं हम धारा के
हमको सब सहना है
इस गहरी नदिया के
संग संग बहना है।

मरघट है -मेले हैं
सुख दुःख है हलचल है
मंदिर है मस्जिद है
कीकर है पीपल है
ये संगी साथी हैं
इनका क्या कहना है?

जो कागज पर चढ़कर
धारा में बहते हैं
मछुआरे उनको ही
प्रगतिशील कहते हैं
हमने तो सन्नाटे का
चीवर पहना है।

सपने हैं अस्थि शेष
लाशें हैं आँखों में
फटता है मन हर दिन
हादसों धमाकों में
कटती है रजत देह
फिर भी चुप रहना है। 

४ नवंबर २०१३

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