अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

अनुभूति में रचना श्रीवास्तव की रचनाएँ-

क्षणिकाओं में-
सात क्षणिकाएँ

नई रचनाएँ-
अभिलाषा
इस ठंड में
तीन क्षणिकाएँ
तुम लौट आना
प्यार में डूबे शब्द
बेटियाँ

छंद मुक्त में-
आओ अब लौट चलें
उजाले की किरण
तमसो मा
बेटी होने की खुशी
रोज़ एक कहानी

 

इस ठंड में

न पूछो
इस ठंड में
हम क्या-क्या किया करते थे
कड़े मीठे अमरूद
हम ठेले से छटा करते थे
सूरज जब कोहरा ओढ़ सोता था
हम सहेलियों संग
पिकनिक मनाया करते थे
छत पे लेट
गुनगुनी धूप लपेट
नमक संग मूँगफली खाया करते थे
धूप से रहती थी कुछ यों यारी
के जाती थी धूप जिधर
उधर ही चटाई खिसकाया करते थे
ठंडी रज़ाई का गरम कोना
ले ले बहन तो
बस झगड़ा किया करते थे
ऐसे में माँ कह दे कोई काम तो
बस मुँह बनाया करते थे
गरम कुरकुरे से बैठे हों सब
ऐसे में दरवाज़े की दस्तक
कौन खोले उठ के
एक दुसरे का मुँह देखा करते थे
लद के कपड़ों से
जब घर से निकला करते थे
मुँह से बनते थे भाप के छल्ले
सिगरेट पीने का भी अभिनय
किया करते थे
जल जाए अंगीठी कभी तो
घर के सारे काम
मनो ठप पड़ जाते थे
सभी उसके आस पास जमा हो
गप लड़ाया करते थे
अपनी ओर की आँच
बढ़े कैसे ये जतन किया करते थे
न पूछो
इस कड़ाके की ठंड में
हम क्या-क्या किया करते थे

२६ जनवरी २००९

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter