अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

अनुभूति में रचना श्रीवास्तव की रचनाएँ-

क्षणिकाओं में-
सात क्षणिकाएँ

नई रचनाएँ-
अभिलाषा
इस ठंड में
तीन क्षणिकाएँ
तुम लौट आना
प्यार में डूबे शब्द
बेटियाँ

छंद मुक्त में-
आओ अब लौट चलें
उजाले की किरण
तमसो मा
बेटी होने की खुशी
रोज़ एक कहानी

  बेटियाँ

तुलसी के बीरे-सी पवित्र
संस्कार में पिरोई बेटियाँ
पतझर या सावन की हवाओं में
चिड़िया-सी उड़ जाती हैं
माँ जीती है
इनमें अपना बचपन
पिता को याद आती हैं
बहनें
वात्सल्य का
एक दरिया बहता है
थाम के उसका एक सिरा
बह जाती हैं
आँगन में
फैलती हैं मूँग बड़ियाँ
बिखेरती हैं
कुछ चावल
दाना चुगते पंछी
चहकती बेटियाँ
धूप के कुछ टुकड़ों संग
बदल देतीं हैं आँगन
दीवाली के घरौंदों,
भोर के तारे
और
झूले पर भीगते
खिलौनों-सी
आँसुओं में
नहा जाती हैं बेटियाँ
सजाती हैं आकाश
जलाती है चौखट पर
स्नेह दीप
दो घरों की लाज बचाती
आँचल में खिलाती हैं फूल
और माँ की तरह बन जाती हैं

२६ जनवरी २००९

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter