अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

अनुभूति में पराशर गौड़ की रचनाएँ—

छंदमुक्त में-
चाह
बहस
बिगुल बज उठा
सज़ा
सैनिक का आग्रह

हास्य व्यंग्य में-
अपनी सुना गया
गोष्ठी
पराशर गौड़ की सत्रह हँसिकाएँ
मुझे छोड़
शादी का इश्तेहार

संकलन में-
नया साल- नूतन वर्ष

बिगुल बज उठा

बिगुल बज उठा रण का
उठ… हुँकारता फुँकारता
दुश्मन के लिए बन मृत्यु का संन्देश
चल, बढ़ा चल आगे उनको चीरता फाड़ता

समय के साथ जीना मरना सीख ले
दुश्मनों को पहिचानना सीख ले
मौत का भय निकाल हृदय से
हाथ में ले तिरंगा चल
उनको ललकारता फुंकारता

रुधिर की परवाह न कर
न घावों को तू गिन
अगर गिनना है तो गिन
दुश्मनों के सरों को गिन
चलता चला चल मध्य में
तू उनको रौंदता फान्दता

जीवन में जीने की इच्छा छोड़
मौत को तू गले चूम ले
मरने से पूर्व कर ऐसा तांडव
दिग दिगंत काँपे दुश्मन हिले
वेग बनकर चल
शिवर उनके उखाडता फेंकता
लेकर विदा भारत भूमि से
माथे पर उसकी माटी तू तिलक लगा
जै जै जै भारत की बोलता
घोष–नाद कर ऐसा
सुनकर घोषणा जिसकी
सरहदों पे काँपे दुश्मन डरा डरा
नेत्रों में लहू उबलता
चल दुश्मनों को घेरता काटता फेंकता
लड़ युद्ध कर
अब तो भृकुटि तन चुकी
ये तो दुश्मनों की नियति बन चुकी
बजा कर बिगुल विनाश का
चल अट्टहास भरता ललकारता

२४ मार्च २००४

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter